काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी
मैं निरे शुन्य मैं बैठी
वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था
हर बार कहता था -
मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं।
हम मिलते
बैठते कई घंटों
फिर चले जाते,
एक दिन मिलते हुए मैंने कहा - साड़ी
और देखा उसे होते हुए बुनकर
जोड़-तोड़ कर ताना-बाना
बुनने लगा है साड़ी
परखने आ गया है उसे
धागों की बुनावट का सलीका।
मैंने कहा सीपियों वाले झुमके
उसे देखा समन्दर किनारे
बढ़ गई है उसकी यात्रा
थोड़ा और सीखने लगा है वो तैराकी
अब नहीं कहता कि डरता है वो बहते पानी से।
मैंने जैसे ही कहा भूख
वो था कहीं किसी खेत की मेड़ पर
अपना खुरपी कुदाल लिए
हाँकते हुए बैलों को
करते हुए अगले फसल के बुआई की तैयारी।
फिर मैंने जब कहा छाँव
उसे पेड़ होते पाया;
खुशबू के सुनते ही
मुझे उसका गुलाब, मोगरा, शिउली होना याद है।
मैंने कहा स्पर्श
और मुझे याद है उसका बच्चा होना
मेरे माथे को चूमना,
मैंने जब भी कहा दुःख
उसने गले लगाने में ज़रा देर नहीं की।
मैंने जैसे ही कहा इंतज़ार
उसे पहाड़ होना आ गया,
मेरे सफ़र कहते ही
बहने लगा वो नदी-सा कल-कल।
मैं जो-जो कहती गई
वो सो-सो होता गया
मैं जो बैठी थी शून्य में
वो जो कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं हूँ
इसी तरह एक दिन
मैं कहूँगी काशी...
मेरे काशी..
और देखूंगी
कैसे होता है वो
अपने आप से मुक्त
और सिमट कर आ जाता है मुझमें
जैसे दुनिया की नाभि से काटकर
अंतिम बार लाए जाते हैं लोग मणिकर्णिका के घाट पर।
मेरा कहना और उसका होते जाना
मेरी इच्छाए और उसकी फ़क़ीरी
गुँथ जाएगी इस तरह
कि एक दिन वो कहेगा कुछ
और मैं होती जाउंगी उसके कहे अनुसार
हम हमारे बन्धन भी हैं
और हम ही हैं हमारी मुक्ति भी।