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घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है । कुमार दिव्यनशु शेखर
कुल जमा चार लोग रहते हैं
छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में
अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग
जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!'
एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का
हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है
धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है।
अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में
चहारदीवारी के बाहर
लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड
अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का।
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
मुझे डर है―
वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
बन न जाए ब्रह्मराक्षस...