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बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान
डर और दबाव के
घटाटोप अनधकार में
बिलबिलाता सूर्य,
कितना भीतर से
जन्मा है सृष्टि के?
भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी
चढ़ नहीं पाया आकाश
बन जाता आकाश सुनहरा तो
सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं
पहुंच जातीं उन नसों में
जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर
बहता है।