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Bhram | Sushma Kumari
07 September 2026

Bhram | Sushma Kumari

Pratidin Ek Kavita

About

भ्रम ।  सुषमा कुमारी 


आसमान में अब बादल नहीं दिखता

दिखता है बादल के होने का एक भ्रम 

पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती

रहता है उनके होने का एक भ्रम।

फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं होतीं

और सड़कों पर अब नहीं होते रास्ते!

इसी तरह

जंगल में अब जंगल नहीं बसता

थाली में नहीं होती रोटी

अख़बार में नहीं होता समाचार,

जीवन में नहीं होता प्रेम!

अब किसान की आत्मा में नहीं बची खेती

युवाओं के आँखों में नहीं बचे सपने

बच्चों के हा्थों में नहीं बचे खिलौने!

देश में अब नहीं बचा देश

आदमी में नहीं बचा थोड़ा-सा आदमी!

हमारे-तुम्हारे परिदृश्य में

इन दिनों बस बचा रह गया है

सबके होने का एक भ्रम!


हमारी-तुम्हारी कलाई पर बंधी घड़ी में

नहीं बचा अच्छा या बुरा समय!

हम विकास की दुनिया के

अभिमंत्रित लोग हैं

जिन्हें अपने ही परिदृश्य से

गायब होती चीज़ें

अब दिखाई नहीं देती!