Baans | Kanhaiyalal Sethia
29 March 2026

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Pratidin Ek Kavita

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बाँस | कन्हैयालाल सेठिया


स्वयं उगते

नहीं उगाए जाते

बाँस,

नहीं होते

उनके सुमन

कोई फल

नहीं उनमें

चंदन की सुवास,

पर बिना बाँस

नहीं बनती बाँसुरी,

ध्वनित होती है

जिसके छिद्रों से

राग रागिनियाँ

बिना उसके

नहीं बनती कलम

जिससे व्यक्त होती हैं

जीवन की अनुभूतियाँ

जो हैं अनमोल

वह बिकते हैं 

कौड़ियाँ के मोल